कविता
हूँ पिता की लाड़ली अफ़सोस आज मनाती हूँ, हर बीती घडी खुद को एहसास कराती हूँ , नहीं हो तुम न लौटोगे बचपन की यादें समेट के संभलती हूँ, है वो ऐसी दुनिया जहाँ चलेगए ना कोई जाता वहाँ न अब मिलसकती हूँ, न जाने कब मुलाकात होगी बस ये याद रखना मेरी हमेशा याद होगी, हैं मन मे कई सवाल, इतना छोटा साथ क्यूँ लिखा था? कैसे अधूरी बातें पूरी करूं ? कैसे पिता की कमी पूरी करूं? थे जैसे तुम न वैसा कोई दूसरा,ये बेटी चाहती है आज कहना: अगर जनम जनम की बात है सच्ची तो हर जनम मेरे पिता तुम ही रहना।





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